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Friday, June 5, 2009

चुनौती



भाग्य और पुरुषार्थ में विवाद उठ खड़ा हुवा उसने कहा में बड़ा दुसरे ने कहा में बड़ा विवाद ने उग्र रूप धारण कर लिया,यश ने मध्यस्था स्वीकार कर निर्णय देने का वचन दिया दोनों को यश ने आज्ञा दी कि तुम मृत्यु लोक में जावो दोनों ने बाहें तो चढा ली पर पूछा ‘महाराज हम दोनों एक ही जगह जाना चाहते है पर जायें कहाँ ? हमें तो ऐसा कोई दिखाई नही देता ‘ यश कि आँखे संसार को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते हमीर पर आकर ठहर गई वह हठ की चुनौती थी
हमीर ने कहा स्वीकार है एक मंगलमय पुन्य प्रभात में हठ कि यहाँ शरणागत वत्सलता ने पुत्री के रूप में जन्म लिया,वह वैभव के मादक हिंडोली में झूलती,आँगन में घुटनों के बल गह्कती,कटि किंकन के घुन्घुरुओ कि रिमझिम के साथ बाल सुलभ मुक्त हास्य के खजाने लुटातीएक दिन सयानी हो गई स्वयंबर में पिता ने घोषणा कि ‘इस अनिन्ध्य सुंदरी को पत्नी बनाने वाले को अपना सब कुछ देना पड़ता है यही इसकी कीमत है ’वह त्याग कि चुनौती थी हमीर ने कहा स्वीकार है त्याग कि परीक्षा आई सोलह श्रंगार से विभूषित,कुलीनता के परिधान धारण कर गंगा कि गति से चलती हुयी शरणागत वत्सलता सुहाग रात्रि के कक्ष में हमीर के समक्ष उपस्थित हुयी -नाथ ! में में आपकी शरण में हु परन्तु मेरे साथ मेरा सहोदर दुर्भाग्य भी बाहर खड़ा है ,क्या फ़िर भी आप मुझे सनाथ करेंगे ?वह भाग्य कि चुनौती थी हमीर ने कहा स्वीकार है
अलाउद्दीन कि फौज का घेरा लगा हुवा था बीच में हमीर कि अटल आन का परिचायक रणथम्भोर का दुर्ग सिर ऊँचा किए इस प्रकार खड़ा था जेसे प्रलय से पूर्व तांडव मुद्रा में भगवान शिव तीसरा नेत्र खोलने के समय कि प्रतीक्षा कर रहें हों,मीरगमरू और मम्मुश कह रहे थे -,इन अदने सिपाहियों के लिया इतना त्याग राजन ! हमारी शरण का मतलब जानते हो ?हजारों वीरों कि जीवन कथाओं का उपसंहार,हजारों ललनाओ कि अतृप्त आकाँक्षाओं का बाल पूर्वक अपहरण,हजारों निर्दोष मानव कलिकाओं को डालियों से तोड़ कर,मसल कर आग में फेंक देना,इन रंगीले महलों के सुनहले यौवन पर अकाल मृत्यु के भीषण अवसाद को डालना ’वह परिणाम कि चुनौती थी हमीर ने कहा स्वीकार है ’भोज्य सामग्री ने कहा -” में किले में नही रहना चाहती,मुझे विदा करो ”वह भूख मरी की चुनौती थी हमीर ने कहा -”स्वीकार है रणचंडी ने कहा - “में राजपूतों और तुम्हारा बलिदान चाहती हूँ ,इस चहकते हुए आबाद किले को बर्बाद कर प्रलय का मरघट बनाना चाहती हूँ ”वह मर्त्यु की चुनौती थी हमीर ने कहा -”स्वीकार है ”

शाका ने आकर कहा केसरियां वस्त्र की भेंट दी और कहा ‘ मुझे पिछले कई वर्षों से बाँके सिपाहियों का साक्षात्कार का अवसर नही मिला मै जिन्दा रहूँगा तब तक पता नही वे रहेंगे या नही ’वह शोर्य की चुनौती थी हमीर ने कहा -”स्वीकार है ”हमीर के हाथो में लोहा बजने लगा अन्तर की प्यास को हाथ पिने लगे उसके पुरुषार्थ का पानी तलवार में चढ़ने लगा खून की बाढ़ आ गई और उसमे अलाउद्दीन की सेना डूब गई मानवता की सरल -हृदया शान्ति ने हमीर की तलवार पकड़ ली और फ़िर उसे छोड़कर चरणों में गिर पड़ी वह विजय की चुनौती थीहमीर ने कहा -”स्वीकार है ’अप्रत्याशित विजय पर हमीर के सिपाही शत्रु सेना के झंडे उछालते,घोडे कुदाते,रणथम्भोर के किले की तरफ जा रहे थे

दुर्भाग्य ने हाथ जोड़कर रह रोक ली - ” हे नृप श्रेष्ठ ! मै जन्म जन्म का अभागा हूँ जिस पर प्रसन्न होता हूँ उसका सब कुछ नष्ट हो जाता है में जनता हूँ मेरी शुभकामनायों का परिणाम क्या हुवा करता है परन्तु आप जेसे निस्वार्थी और परोपकारी क्षत्रिय के समक्ष न झुकाना भी कृतध्नता है आप जेसे पुरुषार्थी मेरा सिर भी फोड़ सकते है,फ़िर भी मेरा अन्तः करण आपकी प्रसंशा के लिए व्याकुल है क्या में आपकी प्रसंशा प्रकट करूँ ?वह विधाता की चुनौती थी हमीर ने कहा - स्वीकार है शत्रु पक्ष के झंडों को उछलते देख दुर्ग के प्रहरी ने परिणाम का अनुमान लगा लिया,बारूद के ढ़ेरी में भगवान का नाम लेकर बती लगादी गई आँख के पलक एक झपके के साथ धरती का पेट फुट गया चहचहाती जवान जिंदगियां मनहूस मौत में बदल गई हजारों वीरांगनाओं का अनूठा सोंदर्य जल कर विकराल कुरूपता से एंठ गया, मंद मंद और मंथर मंथर झोंकों द्वारा बीलोडित पालनों में कोलाहल का अबोध शिशु क्षण भर में ही नीरवता का शव बन चुका था गति और किलोले करते खगव्रन्द ने चहचहाना बंद कर अवसाद में कुरलाना शुरू कर दिया जिंदगी की जुदाई में आकाश रोने लगा सोती हुयी पराजय मुंह से चादर हटाकर खड़ी हो गई कुमकुम का थाल लेकर हमीर के स्वागत के लिए द्वार पर आई - “प्रभु ! मेरी सौत विजय को तो कोई भी स्वीकार कर सकता है परन्तु मेरे महलो में आप ही दीपक जला सकते है ”वह साहस की चुनौती थी हमीर ने कहा -”स्वीकार है”हमीर ने देखा,कारवां गुजर चुका है और उसकी खेह भी मिटने को है , बगीचे मुरझा गए है और खुसबू भटक रही है जीवन के अरमान मिटटी में धूमिल पड़ गए है और उनकी मनोहर स्मर्तियाँ किसी वैरागी की ठोकर की प्रतीक्षा कर रही है,म्रत्यु ने आकर कहा -नर श्रेष्ठ ! अब मेरी ही गोद तुम्हारे लिए खाली है वह निर्भीकता की चुनौती थी हमीर ने कहा -”स्वीकार है ”महाकाल के मन्दिर में हमीर ने हाथों अपना अनमोल मस्तक काट कर चढा दिया पुजारी का लौकिक जीवन समाप्त हो गया परन्तु उसके यश्वी हठ द्वारा स्थापित अलौकिक प्रतिष्ठा ने इतिहास से पूछा -”क्या ऐसा कोई हुवा है ? ” फ़िर उसने लुटे हुए वर्तमान की गोदी में खेलते हुए भविष्य से भी पूछा -”क्या ऐसा भी कोई होगा ? प्रश्न अब भी जिघासु है और उत्तर निरुत्तर रणथम्भोर लुटी हुयी कहानी का सुहाग अभी तक लौट कर नही आया, उसका वैधव्य बीते दिनों की याद में आंसू बहा रहा है यह शरणागत वत्सलता की चुनौती है परन्तु इस चुनौती को कोंन स्वीकार करे ? हमीर की आत्मा स्वर्ग पहुँच गई,फ़िर भी गवाक्षों में लौट कर आज भी कहती है -”स्वीकार है ”यश पुरुषार्थ की तरफ हो गया भाग्य का मुंह उतर गया

नई पीढी आज भी पूछती है -“सिंह गमन सत्पुरुष वचन,कदली फ़लै इक बार तिरया तेल हमीर हठ, चढ़े न दूजी बार जिसके लिए यह दोहा कहा गया वह रणथम्भोर का हठीला कौन था ?

तब अतीत के पन्ने फड फड़ा कर उतर देतें है -”वह भी एक क्षत्रिय था” चित्रपट चल रहा था द्रश्य बदलते जा रहे थे

हाड़ी रानी

हाड़ी रानी और उसकी सैनाणी ( निशानी )


एक ऐसी रानी जिसने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर भिजवा दिया था यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत रतन सिंह चुण्डावत की रानी थी जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले ही उसके पति रावत रतन सिंह चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़ कर रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नही हो रहा था यह बात रानी को पता लगते ही उसने तुंरत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरता पूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नही त्याग पा रहे थे सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रणवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोच कर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के चलते इस वीर रानी ने अपना शीश काट कर ही निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके और रावत रतन सिंह चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गया

Sunday, May 31, 2009

भगवान की गोद


पु.स्व.श्री तनसिंह जी की कलम से (बदलते द्रश्य)


छविगृह में जब में पहुँचा तब चित्र शुरू हो गया था देखने वालों की कमी नही थी किंतु उनमे भी अधिक वे लोग थे जो द्रश्य बनकर लोगों की आंखों में छा जा जाते थे,मै तो आत्मविभोर सा हो गया चित्रपट चल रहा था और द्रश्य बदल रहे थे


राजा उत्तानपाद का पुत्र ध्रुव अपने पिता की गोद के लिए ललचाने लगा किंतु सौतेली माँ सुरुचि की डाह का शिकार बन कर तिरस्कृत हो अपनी माँ सुनीति के पास गया और पूछने लगा,माँ ! क्या मेरे पिता भी है जिनकी गोद में दो क्षण बैठकर स्नेह का एक आध कटाक्ष भी प् सकूँ ?सुनिती कहती है -हाँ बेटा ! तेरे पिता भगवान है जिनके लिए इस संसार की कोई गोद खाली नही होती उन्हें प्रभु की गोद सदेव आमंत्रित किया करती है और ध्रुव पड़ा घर से घोर जंगलों में,अपने छिपे हुए पिता की खोज में,अकड़ते हुए तूफान उसे झुकाने आए किंतु स्वयम झुक कर चले गए,उद्दंड और हिंसक जंतु आए उसे भयभीत करने के लिए किंतु स्वयम नम्रतापूर्वक क्षमा मांगते हुए चले गए,घनघोर वर्षा प्रलय का संकल्प लेकर आई उसकी निष्ठा को बहाने,किंतु उसकी निर्दोष और भोली द्रढता को देखकर अपनी झोली से नई उमंगें बाँट कर चली गई,कष्ट और कठिनाईयों ने सांपो की तरह फुफकार कर उसे स्थान भ्रष्टकरना चाहा किंतु वे भी पुचकारते हुए उत्साहित कर चले गए उसे बालक समझ कर नारद लौट जाने का उपदेश देने आए थे मगर गागर में सागर की निष्ठा देखकर भावमग्न हो अपनी ही वीणा के तार तोड़ कर चले गए एक दिन ऐसा उगा कि पहाड़ पिघलने लग गए,नदियों का प्रवाह ठोस होकर सुन्न पड़ गया,उसकी तपस्या के तेज से स्वयं सूर्य निस्तेज होकर व्याकुल हो उढे,स्रष्टि के समस्त व्यापार विस्मयविमुग्ध हो हतप्रभ से ठिठक कर रुक गए,और तो और स्वयम जगतपिता का अडिग सिंहासन डगमगाने लगा,क्षीरसागर वेदना से खौल उठा ब्रह्मा जी ने वेदपाठ बंद कर भगवान कि और देखा और भगवान अपनी गोदी का आँचल पसार कर गरुड़ की सवारी छोड़ पैदल ही दौडे पड़े
- “बेटा ! रहने दे में तेरा पिता हूँ मुझे नींद आ गई थी आ,मेरी गोद में बैठ- देख,यह कब से सुनी पड़ी है" "परन्तु सुरुचि माता के कहने पर आप मुझे धक्का तो नही देंगे ?नही बेटा,मेरी गोद में तेरा अटल और अचल स्थान रहेगा,जो जन्म-जन्मान्तरों की तपस्या के बाद योगियों और तपस्वियों के लिए भी दुर्लभ है पुजारी ने अपने पूज्य को ही पुजारी बना कर छोड़ा मोह रहित भी मोहित हो गए निराकार साकार हो गए मायारहित होकर भी जगत पिता की आंखों में स्नेह के बादल उमड़ आए ध्रुव अपने घर लौट रहा था और राह के पेड़ पौधे,लता-गुल्म और पशु पक्षी कह रहे थे
"ध्रुव तुम निश्चय ही एक क्षत्रिय हो"
Post By : Pradeep Aabarsar