Monday, June 22, 2009
बड़ा मीठा है मेरा दर्द
ज़हर है वह मगर जिसको पिये बिन जी नहीं सकता॥
कोई कहते हैं जिन्दी है बहारें जिन्दगानी की।
बहुत हमने अदाएं भी बुलाई थी जवानी की।
कभी सपनों में आई हो मगर मैं छू नहीं सकता॥
बड़ा मीठा है...
उड़ाने ली हैं मैंने तो गगन की घाटियों में भी।
पांखें हो चुकी हैं क्लान्त सिर्फ दो मंजिलों में ही।
धधकती आग है दिल में मगर मैं जल नहीं सकता॥
बड़ा मीठा है...
हारा हूं थका हूं मैं संभालो कोई बांहों में
कोई मोती न गिर जाए अरे आंखों की राहों में
जमाना है बड़ा बेरुख मगर मैं मर नहीं सकता॥
बड़ा मीठा है...
नया मेरा बगीचा रे उमीदें लहलहाती है।
हसीं दुनिया बिना इसके न मुझको रंच भाती है।
लगी जलने शमां भी अब, पतंगा रह नहीं सकता॥
बड़ा मीठा है...
बुलाता खून मुझे अपना सदियों बाद सिमटने को।
उठती हूक थी गहरी उमड़ी है भभकने को।
जो थाती कौम की पाई उसे मैं खो नहीं सकता॥
बड़ा मीठा है...
- पूज्य श्री तन सिंह जी
Friday, June 5, 2009
इतिहास की चोटों का
सीने के घराने में इक दर्द लिए फिरते है
हम भूल नही सकते महमूद तेरी गजनी
अब तक भी आंखों में वह खून लिए फिरते है
इतिहास की चोटों का इक दाग लिए फिरते है
बाबर तेरे प्याले टूटे बता कितने ?
पर सरहदी का अफ़सोस लिए फिरते है
इतिहास की चोटों का इक दाग लिए फिरते है
झाला था इक माना कुरम था इक माना
सोने के लगे जंग पै अचरज लिए फिरते है
इतिहास की चोटों का इक दर्द लिए फिरते है
कर्जन तेरी दिल्ली में अनमी था इक राना
सड़कों पे गिरे ताजों के रत्न चुगा फिरते है
इतिहास की चोटों का इक दर्द लिए फिरते है
आपस में लड़े भाई गैरों ने हमें कुचला
अब मिलकर लड़ने का अरमान लिए फिरते है
इतिहास की चोटों का इक दाग लिए फिरते है
आराम कहाँ जब जीवन में अरमान अधूरे रह जाते |
आराम कहाँ जब जीवन में अरमान अधूरे रह जाते
दिल की धड़कन शेष रहे हाथों के तोते उड़ जाते
तिल-तिल कर तन की त्याग तपस्या का अमृत संचय करते
अमिय भरे रस कुम्भ कभी यदि माया की ठोकर खाते
सागर में सीपें खोज-खोज माला में मोती पोये थे
पर हाय ! अचानक टूट पड़े यदि प्रेम तंतु जब पहनाते
घोर अँधेरी रात्रि में था दीप जला टिम-टिम करता
अंधेर हुआ जब बह निकला नैराश्य पवन मग में चलते
निर्जीव अँगुलियों के चलते स्वर साधक बनना सीखा था
मादक वीणा के टूट चुके हों तार अभागे हा ! बजते
बचपन में बाहें डाल चले सोचा था साथी है जग में
दो कदम चले फिर बिछुड़ गए एकाकी को आराम कहाँ ?
श्री तन सिंह ,बाड़मेर ११ अगस्त १९४९
बलि पथ के सुंदर प्राण

चुनौती

हमीर ने कहा स्वीकार है एक मंगलमय पुन्य प्रभात में हठ कि यहाँ शरणागत वत्सलता ने पुत्री के रूप में जन्म लिया,वह वैभव के मादक हिंडोली में झूलती,आँगन में घुटनों के बल गह्कती,कटि किंकन के घुन्घुरुओ कि रिमझिम के साथ बाल सुलभ मुक्त हास्य के खजाने लुटातीएक दिन सयानी हो गई स्वयंबर में पिता ने घोषणा कि ‘इस अनिन्ध्य सुंदरी को पत्नी बनाने वाले को अपना सब कुछ देना पड़ता है यही इसकी कीमत है ’वह त्याग कि चुनौती थी हमीर ने कहा स्वीकार है त्याग कि परीक्षा आई सोलह श्रंगार से विभूषित,कुलीनता के परिधान धारण कर गंगा कि गति से चलती हुयी शरणागत वत्सलता सुहाग रात्रि के कक्ष में हमीर के समक्ष उपस्थित हुयी -नाथ ! में में आपकी शरण में हु परन्तु मेरे साथ मेरा सहोदर दुर्भाग्य भी बाहर खड़ा है ,क्या फ़िर भी आप मुझे सनाथ करेंगे ?वह भाग्य कि चुनौती थी हमीर ने कहा स्वीकार है
अलाउद्दीन कि फौज का घेरा लगा हुवा था बीच में हमीर कि अटल आन का परिचायक रणथम्भोर का दुर्ग सिर ऊँचा किए इस प्रकार खड़ा था जेसे प्रलय से पूर्व तांडव मुद्रा में भगवान शिव तीसरा नेत्र खोलने के समय कि प्रतीक्षा कर रहें हों,मीरगमरू और मम्मुश कह रहे थे -,इन अदने सिपाहियों के लिया इतना त्याग राजन ! हमारी शरण का मतलब जानते हो ?हजारों वीरों कि जीवन कथाओं का उपसंहार,हजारों ललनाओ कि अतृप्त आकाँक्षाओं का बाल पूर्वक अपहरण,हजारों निर्दोष मानव कलिकाओं को डालियों से तोड़ कर,मसल कर आग में फेंक देना,इन रंगीले महलों के सुनहले यौवन पर अकाल मृत्यु के भीषण अवसाद को डालना ’वह परिणाम कि चुनौती थी हमीर ने कहा स्वीकार है ’भोज्य सामग्री ने कहा -” में किले में नही रहना चाहती,मुझे विदा करो ”वह भूख मरी की चुनौती थी हमीर ने कहा -”स्वीकार है रणचंडी ने कहा - “में राजपूतों और तुम्हारा बलिदान चाहती हूँ ,इस चहकते हुए आबाद किले को बर्बाद कर प्रलय का मरघट बनाना चाहती हूँ ”वह मर्त्यु की चुनौती थी हमीर ने कहा -”स्वीकार है ”
हाड़ी रानी
हाड़ी रानी और उसकी सैनाणी ( निशानी )
एक ऐसी रानी जिसने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर भिजवा दिया था यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत रतन सिंह चुण्डावत की रानी थी जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले ही उसके पति रावत रतन सिंह चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़ कर रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नही हो रहा था यह बात रानी को पता लगते ही उसने तुंरत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरता पूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नही त्याग पा रहे थे सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रणवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोच कर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के चलते इस वीर रानी ने अपना शीश काट कर ही निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके और रावत रतन सिंह चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गया
स्व.पु.श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकें
